सिरमौर जिले की समृद्ध लोक संस्कृति और विलुप्त होती परंपराओं को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास लगातार जारी है। इसी कड़ी में पौराणिक डिगड़ी अथवा डिग्याई नृत्य को देश-विदेश के मंचों तक पहुंचाया जा रहा है। पद्मश्री विद्यानंद सारैक और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लोक कलाकार डॉ. जोगेंद्र हाब्बी ने इस लोक विधा से जुड़े पौराणिक और सांस्कृतिक पहलुओं की जानकारी साझा की।
बताया गया कि डिगड़ी नृत्य का उल्लेख हिमाचल के लोक साहित्य के साथ शिष पंचांग में भी मिलता है। लोक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के आठ दिन बाद इस नृत्य का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि कंस द्वारा भेजी गई डंकनियों के वध के बाद भगवान कृष्ण ने उन्हें वर्ष में दो रातें नृत्य करने की अनुमति दी थी। इनमें एक रात महिलाओं और दूसरी पुरुषों के लिए निर्धारित मानी जाती है।
डिगड़ी पर्व से पहले विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। पंडित देव मंदिर से सरसों लाकर ग्रामीणों में बांटते हैं। ग्रामीण सरसों को गोबर के साथ मिलाकर घरों के दरवाजों पर लगाते हैं और कांटेदार भीखड़ पौधे की स्थापना कर पूजा करते हैं। इस परंपरा से जुड़ी कन्हैया गाथा ‘पडवायन’, रामायण, हारुल और बार जैसी लोक गाथाओं का भी संकलन किया गया है।
डिगड़ी नृत्य में विशेष भयंकर मुखौटों और परिधानों का प्रयोग किया जाता है। इनमें लंबे दांत, डरावनी आंखें, लंबी जीभ और सर्पाकार आभूषणों जैसे प्रतीकों को दर्शाया जाता है। नृत्य की शुरुआत देव पूजा से होती है, जिसमें गुर और गणितों की प्रस्तुति भी होती है।
यह लोक विधा भोपाल के आदिवासी कला केंद्र और गोवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल सहित विभिन्न मंचों पर प्रस्तुत की जा चुकी है। पद्मश्री विद्यानंद सारैक के निर्देशन में सिंह, बढ़ाल और ठोडा जैसी अन्य विलुप्तप्राय लोक परंपराओं पर भी शोध कर उन्हें व्यापक पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।
सोलन : सिरमौर की विलुप्त होती डिगड़ी नृत्य परंपरा को मिला राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच