‘सोने की थाली’ भी संभाल न पाई कांग्रेस! बीडीसी चुनाव के बाद मनोज वर्मा का तीखा तंज “संघर्ष समिति किसी राजनीतिक दल की ‘पिट्ठू’ नहीं, विकास के मुद्दे पर जो साथ देगा, उसी का मिलेगा साथ”

सोलन। बीडीसी उपाध्यक्ष पद के चुनाव परिणाम के बाद जिला की ग्रामीण राजनीति में बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष मनोज वर्मा ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति और राजनीतिक प्रबंधन पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि राजनीति में मौके बार-बार नहीं आते और जो समय पर निर्णय नहीं लेते, सत्ता उनके हाथ से रेत की तरह फिसल जाती है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोगों को यदि “सोने की थाली” में भी अवसर परोस दिया जाए तो वे उसकी कीमत नहीं समझ पाते। वर्मा ने दावा किया कि संघर्ष समिति विकास के मुद्दों को लेकर सभी पक्षों के पास गई थी, लेकिन कांग्रेस उस अवसर को भुनाने में नाकाम रही, जबकि भाजपा ने मौके को हाथों-हाथ लपक लिया। उन्होंने कहा कि बीडीसी चुनाव के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति केवल संख्या बल से नहीं, बल्कि संवाद, सम्मान और समय पर लिए गए फैसलों से चलती है।

मनोज वर्मा ने यह भी स्पष्ट किया कि संघर्ष समिति किसी राजनीतिक दल की ‘पिट्ठू’ नहीं है और न ही किसी के इशारों पर काम करती है। उन्होंने कहा कि समिति का एकमात्र उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों का विकास और जनता की समस्याओं का समाधान है। “एक हाथ देंगे, एक हाथ लेंगे” की नीति पर चलते हुए संघर्ष समिति उसी के साथ खड़ी होगी जो विकास कार्यों में सहयोग करेगा। वर्मा ने सत्ताधारी नेताओं को भी चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि सड़क, बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं के मुद्दों पर सवाल उठाना जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि संघर्ष उनका स्वभाव है और जनता के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीडीसी चुनाव के बाद संघर्ष समिति की भूमिका और अधिक प्रभावशाली होकर उभरी है, जबकि कांग्रेस को अपनी रणनीतिक चूकों पर आत्ममंथन करना पड़ सकता है। ग्रामीण राजनीति के इस नए समीकरण ने आने वाले समय में जिला की सियासत को और दिलचस्प बना दिया है।

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