आश्विन संक्रांति के साथ ही हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास का आगमन हो गया है। इसके साथ ही क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का भी शुभारंभ होता है। दुर्गा माता मंदिर मॉल रोड सोलन के पंडित मदन दत्त शर्मा ने आश्विन मास के धार्मिक महत्व और इस दौरान निभाई जाने वाली परंपराओं की जानकारी दी।
पंडित मदन दत्त शर्मा के अनुसार भाद्रपद मास को क्षेत्र में काला महीना माना जाता है। इस दौरान आमतौर पर शुभ एवं मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है। आश्विन संक्रांति के साथ भाद्रपद मास की समाप्ति और आश्विन मास की शुरुआत होती है। इसके बाद शुभ मुहूर्त में विवाह सहित अन्य मांगलिक कार्यों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
उन्होंने बताया कि आश्विन मास के आगमन पर क्षेत्र में सैर मेला, जिसे स्थानीय स्तर पर सारसा जी के नाम से भी जाना जाता है, मनाने की परंपरा है। इस अवसर पर लोग नई फसल को घर लाकर उसका दर्शन करते हैं। एक थाली में मक्की, अखरोट, अदरक सहित अन्य नई फसलों को रखकर विधिवत पूजन किया जाता है। नई फसल के अंश को बांदा के रूप में अपने इष्ट देवता को समर्पित करने की भी परंपरा है।
सैर के अवसर पर शीशे में अपने मुख का दर्शन करने की परंपरा भी निभाई जाती है। इसके बाद शरीर पर बंधे धागे अथवा सूत्र को काटा जाता है। मान्यता के अनुसार यह पुरानी अवधि की समाप्ति और नए समय के शुभारंभ का प्रतीक माना जाता है।
पंडित शर्मा ने बताया कि आश्विन संक्रांति के बाद मक्की, अदरक सहित अन्य फसलों की कटाई का कार्य भी कई क्षेत्रों में शुरू हो जाता है। इस तरह सैर मेला धार्मिक आस्था के साथ कृषि और स्थानीय संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है।