सोलन। दशहरे पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इन पुतलों को तैयार करने के पीछे कारीगरों की कई दिनों की मेहनत और कला छिपी होती है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर निवासी शाहनवाज पिछले करीब 40 वर्षों से सोलन में दशहरे के लिए पुतले तैयार कर रहे हैं। खास बात यह है कि वह इस काम को व्यावसायिक लाभ के बजाय अपने शौक और पहाड़ों के प्रति लगाव के कारण करते हैं।
शाहनवाज के अनुसार, जब उन्होंने शुरुआती दौर में सोलन आना शुरू किया था, तब दशहरा मैदान छोटा हुआ करता था। उस समय यहां करीब 25 फीट ऊंचा एक ही पुतला बनाया जाता था। समय के साथ मैदान का आकार बढ़ा और आयोजन का स्वरूप भी बदल गया। अब रावण का पुतला करीब 40 फीट ऊंचा तैयार किया जाता है, जबकि मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों की ऊंचाई 30 से 35 फीट तक रहती है।
इन विशाल पुतलों को तैयार करने के लिए शाहनवाज के साथ करीब 10 लोगों की टीम मेहनत करती है। पुतलों के निर्माण में कारीगरी, समय और सावधानी की जरूरत होती है। शाहनवाज का कहना है कि बेहतर पुतले तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिलना जरूरी है। यदि एक महीने में पूरा होने वाला काम केवल एक सप्ताह में करने का दबाव हो, तो कारीगरी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने टेंडर व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, कम बजट में काम लेने के कारण कई बार निर्माण कार्य प्रभावित होता है। कुछ मामलों में ठेकेदार काम अधूरा छोड़ देते हैं, जिससे आयोजन की तैयारियों में परेशानी आती है। पुतलों को मैदान में सुरक्षित तरीके से खड़ा करना भी चुनौतीपूर्ण होता है।
इन समस्याओं के बावजूद शाहनवाज हर वर्ष दशहरे के लिए पुतले तैयार करने में जुट जाते हैं। उनका कहना है कि दशहरे के दिन पुतलों को मैदान में खड़ा करना उनकी पहली प्राथमिकता होती है। सोलन से उनका चार दशक पुराना जुड़ाव उनकी कला, लगाव और परंपरा के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
सोलन में 40 सालों से रावण के पुतले बना रहे शाहनवाज, पैसों के लिए नहीं शौक से करते हैं काम