कंगना रनौत का अधिकारियों पर गुस्सा, विकास कार्यों में देरी पर लगाई फटकार; मर्यादा पर भी उठे सवाल

Kangana Ranaut at Disha Committee meeting

सरकारी फाइलों के ‘जुमलों’ पर भड़कीं कंगना मंडी लोकसभा क्षेत्र से भाजपा सांसद कंगना रनौत की हालिया दिशा कमेटी (Disha Committee) की बैठक का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वे प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही और सुस्ती पर बेहद तीखे तेवर अपनाए हुए हैं। विकास कार्यों में हो रही देरी और संसदीय निधि (MP LAD Funds) के बेअसर इस्तेमाल को लेकर उन्होंने अधिकारियों की जम कर क्लास लगाई। रिपोर्ट के अनुसार, बैठक के मुख्य गर्मागर्म मुद्दे निम्नलिखित रहे: करोड़ों की निधि और शून्य परिणाम: सांसद का आरोप है कि उन्होंने संसदीय निधि से 11 करोड़ रुपये जारी किए हैं, लेकिन धरातल पर काम शून्य के बराबर है।

उन्होंने अधिकारियों पर तीखा हमला बोलते हुए पूछा कि क्या वे केवल ‘तनख्वाह खाने’ आते हैं। दस्तावेजों में हेराफेरी और निष्क्रियता: कंगना ने गंभीर आरोप लगाया कि कई लोग झूठे अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) पर हस्ताक्षर कराकर पैसे दबाए बैठे हैं, जबकि उनके पास न जमीन है और न ही आवश्यक अनुमतियां। उन्होंने अधिकारियों को तुरंत ऐसे लोगों को समन जारी करने और सार्वजनिक पैसा वापस लेने का कड़ा निर्देश दिया। कागजी दावे बनाम जमीनी हकीकत: उन्होंने अधिकारियों के आश्वासनों को “फालतू के जुमले” करार दिया। उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने पहले दावा किया था कि 90% पैसा धरातल पर लग चुका है और कोई समस्या नहीं है, लेकिन बाहरी एजेंसियों के विस्तृत सर्वेक्षण ने इस दावे की पोल खोल दी। आंकड़ों की भयावह हकीकत: मार्च-अप्रैल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए सांसद ने कहा कि पिछले दो सालों में 11 करोड़ में से पूरे क्षेत्र में 1 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हुए थे, और मंडी क्षेत्र के लिए आवंटित 5 करोड़ में से मात्र 50 से 60 लाख रुपये ही इस्तेमाल हुए थे। वर्तमान स्थिति यह है कि कुल निधि का आधा हिस्सा (लगभग 5.5 करोड़) अब भी अप्रयुक्त पड़ा है। इस भारी बैकलॉग के कारण वे अगले साल की सांसद निधि भी वितरित नहीं कर पा रही हैं। प्रशासनिक विफलता और ट्रेनिंग का अभाव: कुल्लू और मंडी कार्यालयों की ढिलाई को उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने काम पूरा कर लिया है, उन्हें ऑनलाइन डेटा अपलोड करना नहीं आता, और अधिकारियों ने उन्हें इसके लिए कोई ट्रेनिंग नहीं दी है। कड़े कदम उठाने की चेतावनी: कंगना ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि प्रत्येक क्षेत्र और व्यक्ति की प्रगति (60%, 40% या 20%) की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाए। उन्होंने अधिकारियों से जिला कलेक्टर (DC) के साथ मिलकर फर्जीवाड़ा करने वालों के खिलाफ जुर्माना लगाने और उन्हें हमेशा के लिए सांसद निधि से ब्लैकलिस्ट करने के लिए कड़े नियम बनाने को कहा।

1. जनता के पैसे पर जवाबदेही का पक्ष (कंगना के गुस्से का औचित्य): प्रशासनिक सुस्ती और विकास कार्यों में हो रही हीलाहवाली पर कंगना का गुस्सा पूरी तरह से जायज प्रतीत होता है। जब एक जनप्रतिनिधि जनता के विकास के लिए 11 करोड़ रुपये की राशि आवंटित करता है, और अधिकारी फर्जी एनओसी पर पैसे दबाकर बैठ जाते हैं या फंड का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही खर्च कर पाते हैं, तो यह सीधे तौर पर जनता और लोकतंत्र के साथ धोखा है। अधिकारियों की इस लापरवाही के कारण विकास कार्यों का बैकलॉग बन गया है और सांसद अगले साल की निधि भी नहीं बांट पा रही हैं। विकास कार्यों को गति देने के लिए केंद्र से पत्र भेजकर डराना पड़ता है। ऐसी स्थिति में अधिकारियों से कड़ाई से जवाबदेही मांगना एक सजग जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है। 2. अमर्यादित शब्दावली और प्रशासनिक गरिमा का उल्लंघन (तीखी टिप्पणी): परंतु, जिस प्रकार की भाषा और उपमाओं का कंगना ने बैठक में प्रयोग किया, वह संसदीय शिष्टाचार और एक जिम्मेदार लोकसेवक के पद की गरिमा के अनुकूल कतई नहीं है।

अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल: देश की सर्वोच्च संस्था की सदस्य होते हुए अधिकारियों को “निठल्ली”, “निखिष्ट”, “महा लेज़ी और महा फूहड़ किस्म के लोग” कहना, और स्वयं को “इतने सारे लोगों के बीच इडियट्स की तरह पैसा बांटने वाली” बताना, राजनीति के स्तर को गिराता है। किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच आपसी सम्मान का होना अनिवार्य है। फिल्मी अंदाज़ और अहंकार: बैठक में उनका यह कहना कि “मुझे तुम्हारा एक ऑफिस मिले ना, तो मैं एक दिन में ये सारा काम करके दिखा दूंगी”, उनकी प्रशासनिक समझ की कमी या फिर ‘फिल्मी नायकत्व’ (सिनेमैटिक ब्लस्टर) को दर्शाता है। सरकारी नीतियां और फाइलें नियमों और प्रक्रियाओं के तहत चलती हैं, जिन्हें एक दिन में केवल भाषणबाज़ी से नहीं बदला जा सकता। अपने ही क्षेत्र के लोगों का अपमान: खुद अपने ही क्षेत्र के पहाड़ी लोगों के वर्क एथिक्स पर सवाल उठाना और उन्हें राष्ट्रीय मीडिया के सामने नीचा दिखाने की बात करना, उनके अपने मतदाताओं के प्रति संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

निष्कर्ष: यह सच है कि हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में विकास कार्यों की कछुआ गति और लालफीताशाही एक गंभीर समस्या है, जिस पर कड़े निर्णय लेने की आवश्यकता है। लेकिन, प्रशासनिक सुधार कभी भी गालियों, व्यक्तिगत अपमान या अमर्यादित भाषा से नहीं लाए जा सकते। कंगना रनौत को यह समझना होगा कि वे अब केवल एक बॉलीवुड अभिनेत्री नहीं बल्कि देश की संसद की सम्मानित सदस्य हैं। उन्हें अपनी ‘दबंग छवि’ से आगे बढ़कर, प्रशासनिक मर्यादा के भीतर रहकर काम करवाने की कूटनीतिक कला सीखनी होगी, अन्यथा नौकरशाही के साथ यह असहज टकराव मंडी के विकास कार्यों को और अधिक गतिहीन बना देगा।

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