सोलन। भारतीय चिकित्सा पद्धति, योग और नशा मुक्ति अभियान को लेकर आयोजित कार्यक्रम में राज्यपाल ने पारंपरिक चिकित्सा के महत्व और समाज में बढ़ते नशे की समस्या पर विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के दौरान भारतीय चिकित्सा पद्धति, योग और पंचतत्व चिकित्सा से संबंधित गतिविधियों का प्रदर्शन किया गया।
राज्यपाल ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में विभिन्न प्रकार के परीक्षणों के माध्यम से बीमारियों की पहचान की जाती है, जबकि पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में पहले नाड़ी परीक्षण के माध्यम से रोग की स्थिति का आकलन किया जाता था। उन्होंने भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के अध्ययन, संरक्षण और इनके बारे में लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां उपयोगी साबित हो सकती हैं। कार्यक्रम के दौरान केंद्र की व्यवस्थाओं और इसे स्थापित करने में किए गए प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने मूर्ति जी के प्रयासों की प्रशंसा की और उन्हें बधाई दी।
राज्यपाल ने हिमाचल प्रदेश को देवभूमि बताते हुए प्रदेश में नशे के बढ़ते प्रसार पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि नशा समाज के लिए गंभीर चुनौती है और इसका असर विशेष रूप से युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। नशे की समस्या से निपटने के लिए केवल प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
उन्होंने कहा कि स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने के साथ सामाजिक संस्थाओं और गैर सरकारी संगठनों को भी नशा विरोधी अभियान से जोड़ना आवश्यक है। परिवारों में बच्चों को अच्छे संस्कार देने और उन्हें नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने पर भी उन्होंने जोर दिया।
राज्यपाल ने कहा कि नशे के खिलाफ समाज को एकजुट होकर कंधे से कंधा मिलाकर काम करना होगा। उन्होंने युवाओं को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और योग सहित सकारात्मक गतिविधियों से जुड़ने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता बताई। कार्यक्रम के दौरान चिकित्सा केंद्र में उपचार के लिए निर्धारित शुल्क से संबंधित जानकारी मांगे जाने पर उन्होंने कहा कि इसकी जानकारी उनके पास उपलब्ध नहीं है।