शिमला
कांग्रेस का शो–पीस कार्यक्रम “वोट चोर, गद्दी छोड़” एक बार फिर दल की फूट का आइना बनकर रह गया। मंच पर प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल और सह प्रभारी चेतन चौहान मौजूद थे, लेकिन कार्यकर्ताओं ने यह साबित कर दिया कि कांग्रेस में अब न नेताओं का नियंत्रण बचा है और न अनुशासन की कोई लकीर। दरअसल यह कार्यक्रम भाजपा पर सीधा हमला करने के लिए था, लेकिन नारेबाज़ी ने ही कांग्रेस की फूट और गुटबाज़ी का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया। प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह के समर्थक जहाँ अपने नेताओं के समर्थन में नारे मारते रहे, वहीं मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के समर्थक सीएम के पक्ष में हल्ला बोलते नज़र आए। नतीजा यह हुआ कि “गद्दी छोड़” का कार्यक्रम कुछ ही देर में गद्दी हथियाने का शक्ति प्रदर्शन बन गया।स्थिति इतनी बिगड़ गई कि सह प्रभारी चेतन चौहान को मंच से उतरकर कार्यकर्ताओं को शांत करने की नाकाम कोशिश करनी पड़ी। लेकिन कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने उन्हें भी अनसुना कर दिया। मीडिया के सामने पार्टी की किरकिरी होती देख आयोजकों को मीडिया को कार्यक्रम स्थल से ही शिफ्ट करना पड़ा। यह कांग्रेस की उस दुर्दशा का जीता-जागता उदाहरण था, जहाँ नेताओं के व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ पार्टी की रीढ़ को खोखला कर चुकी हैं।प्रदेश कांग्रेस की कार्यकारिणी महीनों से भंग है और नए अध्यक्ष के चयन को लेकर दिल्ली दरबार में लॉबिंग और गुटबाज़ी चरम पर है। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि जो पार्टी अपनी कुर्सी पर बैठने को लेकर ही एकजुट नहीं हो पा रही, वह सत्ता पर बैठी बीजेपी को गद्दी से उतारने का सपना कैसे देख सकती है?कांग्रेस का यह कार्यक्रम बता गया कि गुटबाज़ी की आग अब खुले मंच पर दहाड़ रही है और पार्टी का हर नेता केवल अपनी-अपनी गद्दी के लिए जूझ रहा है। जनता का मुद्दा, संगठन की एकजुटता और विपक्ष की जिम्मेदारी सब कुछ नारेबाज़ी और अहंकार की होड़ में दब कर रह गया है।