बघाट बैंक घोटाले में सबसे चिंताजनक पहलू अब सिर्फ 400 करोड़ रुपये का फंसना नहीं, बल्कि शेयरहोल्डर्स के संघर्ष का लगातार कमजोर पड़ना बन गया है। वर्षों से प्रेस वार्ताएं, बयानबाजी और मीडिया के जरिए दबाव बनाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इस रणनीति का सरकार और प्रबंधन पर कोई असर नहीं दिख रहा। पूर्व मंत्री महेंद्र नाथ सोफत की मौजूदगी में भी उठ रही आवाजें सिर्फ सुर्खियों तक सीमित होकर रह गई हैं। जमीनी स्तर पर न तो कोई ठोस जनदबाव बन पाया है और न ही कानूनी मोर्चे पर निर्णायक पहल नजर आती है। नतीजा—तंत्र बेखौफ है और कार्रवाई अब भी ठंडी फाइलों में कैद है।महेंद्र नाथ सोफत ने कहा कि । भारतीय रिजर्व बैंक की पाबंदियों की समयसीमा खत्म होने को है, लेकिन रिकवरी सिर्फ कागजों में चल रही है—5 करोड़ के बदले 5 लाख के बाउंस चेक और कुड़की के समय गायब अधिकारी। शेयरहोल्डरों को 2018 से कोई लाभांश नहीं मिला, उनकी 22 करोड़ की पूंजी पर भी बैंक कब्जा जमाए बैठा है। सरकार पर कोई असर नहीं हो रहा है इस लिए अब वह क़ानून का दरवाजा खटखटाएंगे।