सोलन के चंबाघाट स्थित आईसीएआर-खुंब अनुसंधान निदेशालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार ने शिटाके मशरूम की बढ़ती वैश्विक मांग और इसके औषधीय महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शिटाके को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘नंबर वन’ मशरूम का दर्जा प्राप्त है, हालांकि भारत में इसकी खेती अभी सीमित स्तर पर ही हो रही है।
डॉ. कुमार के अनुसार शिटाके की खेती लकड़ी के बुरादे और अन्य सबस्ट्रेट पर की जाती है। निदेशालय के पास इसकी उन्नत तकनीक उपलब्ध है, जिसे किसानों तक पहुंचाया जा रहा है। पहले शिटाके की कुछ किस्मों को तैयार होने में अधिक समय लगता था, लेकिन निदेशालय के वैज्ञानिकों ने एक विशेष कम अवधि वाली खेती तकनीक विकसित की है। इस तकनीक के तहत लगभग 45 से 50 दिनों में मशरूम की फ्रूटिंग शुरू हो जाती है। इस नवाचार के लिए निदेशालय को पेटेंट भी प्राप्त हुआ है और एमओयू के माध्यम से यह तकनीक किसानों को दी जा रही है।
डॉ. कुमार ने बताया कि शिटाके मशरूम केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि औषधीय गुणों के लिए भी प्रसिद्ध है। इसमें पाया जाने वाला ‘लेंटिनन’ कंपाउंड कैंसर के उपचार के दौरान रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और इलाज में सहयोग देने में सहायक माना जाता है।