जिला सोलन में नवजात शिशुओं की बेहतर देखभाल और मातृ-शिशु स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में प्रसूति केंद्रों पर कार्यरत चिकित्सा अधिकारियों और स्टाफ नर्सों को नवजात शिशु की समुचित देखभाल और खतरे के संकेतों की पहचान संबंधी जानकारी दी गई।
इस अवसर पर जानकारी देते हुए डॉ. अजय पाठक ने बताया कि नवजात की जीवन रक्षा के लिए शुरुआती घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने कहा कि जन्म के तुरंत बाद स्तनपान कराना आवश्यक है, क्योंकि प्रारंभिक दूध (कोलोस्ट्रम) शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। उन्होंने यह भी बताया कि सर्दी के मौसम में नवजात को गर्म रखना, खुले में स्नान से बचाना और नाभि पर किसी प्रकार की घरेलू दवा या पदार्थ का प्रयोग न करना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण (सेप्सिस) का खतरा बढ़ जाता है।
डॉ. पाठक ने बताया कि माताओं, परिवारों और आशा कार्यकर्ताओं को नवजात में सुस्ती, दूध न पीना या अत्यधिक रोना जैसे खतरे के संकेतों की पहचान अवश्य होनी चाहिए। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में जांच करानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि गर्भवती महिलाओं को चार प्रसवपूर्व जांचें, उचित पोषण और आयरन, फोलिक एसिड व कैल्शियम की खुराक नियमित रूप से लेनी चाहिए। यह पहल मातृ व शिशु मृत्यु दर कम करने की दिशा में एक प्रभावी कदम है।
नवजात शिशुओं की देखभाल व खतरे के संकेतों पर स्वास्थ्य कर्मियों को किया गया जागरूक