जब शिक्षा का मंदिर बन गया यातना का अखाड़ा: एक छात्रा की मौत, सैकड़ों सवाल
धर्मशाला: रैगिंग और जातिगत प्रताड़ना ने छीनी एक बेटी की जिंदगी
“मां, मुझे कॉलेज नहीं जाना…”
ये आखिरी शब्द थे एक 18-19 साल की उस मासूम बच्ची के, जो ज्ञान की तलाश में कॉलेज गई थी, लेकिन वहां उसे मिला सिर्फ अपमान, प्रताड़ना और इतना गहरा मानसिक आघात कि वह मौत को गले लगाने पर मजबूर हो गई।
26 दिसंबर 2025 को डीएमसी लुधियाना में जब उस बीए प्रथम वर्ष की छात्रा ने अंतिम सांस ली, तो सिर्फ एक परिवार ही नहीं टूटा, बल्कि हमारी तथाकथित सभ्य शिक्षा व्यवस्था का चेहरा भी बेनकाब हो गया।
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क्या गुनाह था उस मासूम का?
सिर्फ इतना कि वह अपने सपने पूरे करना चाहती थी। सिर्फ इतना कि वह अपने परिवार का नाम रोशन करना चाहती थी। लेकिन धर्मशाला के उस कॉलेज में कुछ छात्राओं ने उसके साथ वो किया जो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
रोज की रैगिंग। लगातार जातिगत अपमान। मानसिक प्रताड़ना का ऐसा सिलसिला कि वह टूट गई, बिखर गई, अवसाद के अंधेरे में खो गई।
घर में उसका व्यवहार असामान्य होने लगा। एक खिलखिलाती बच्ची अचानक चुप रहने लगी। आंखों में आंसू और दिल में अनगिनत दर्द लिए वह हर दिन उस नर्क में जाने को मजबूर थी जिसे हम “कॉलेज” कहते हैं।
प्रशासन की लापरवाही: जब चीखें अनसुनी रह गईं
और सबसे बड़ा सवाल – कॉलेज प्रशासन कहां था?
पिता ने शिकायत की। परिवार ने गुहार लगाई। 20 दिसंबर को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज करवाई गई।
लेकिन क्या हुआ?
कॉलेज प्रशासन ने आश्वासन दिया – “स्वस्थ होने के बाद जांच होगी।”
स्वस्थ होने के बाद?
मतलब जब तक वह जिंदा रहे, तब तक कोई कार्रवाई नहीं?
पुलिस ने जांच शुरू की, लेकिन छात्रा बयान देने की हालत में नहीं थी। पिता के कहने पर मामला बंद कर दिया गया।
और फिर 26 दिसंबर को वह चली गई… हमेशा के लिए।
वीडियो में छिपा था सच का चीख
मौत से पहले एक वीडियो सामने आया। उस वीडियो में उस बच्ची ने अपने साथ हुए अत्याचारों का खुलासा किया था।
अब जाकर पुलिस की नींद खुली। अब जाकर एफआईआर दर्ज हुई। अब जाकर जांच की बात हो रही है।
लेकिन अब क्या फायदा?
क्या वह बच्ची वापस आ जाएगी? क्या उसके माता-पिता का दर्द कम हो जाएगा? क्या उनके सपने फिर से जिंदा हो जाएंगे?
पुलिस अधीक्षक कांगड़ा अशोक रत्न ने कहा है कि “वीडियो में लगाए गए आरोपों, कॉलेज प्रशासन, शिक्षकों और छात्रों की भूमिका की गहन जांच होगी।”
लेकिन ये जांच कब की जानी चाहिए थी? मौत के बाद या मौत से पहले?
सवाल जो हर किसी से पूछे जाने चाहिए
कॉलेज प्रशासन से:
- क्या आपके परिसर में एंटी-रैगिंग सेल है या सिर्फ कागजों पर?
- क्या शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई नहीं की जा सकती थी?
- क्या आपके लिए एक बच्ची की जान से ज्यादा कीमती है कॉलेज की “इज्जत”?
उन छात्राओं से जिन्होंने प्रताड़ित किया:
- क्या ये तुम्हारी संस्कृति है? क्या ये तुम्हारी तहजीब है?
- क्या किसी को जाति के आधार पर अपमानित करना तुम्हें बड़ा बनाता है?
- क्या तुम्हें पता है कि तुमने एक परिवार को तबाह कर दिया?
पुलिस प्रशासन से:
- 20 दिसंबर को शिकायत आई, 26 दिसंबर को मौत हुई – बीच के 6 दिनों में क्या किया?
- क्या हर बार वीडियो वायरल होने का इंतजार करना पड़ेगा?
समाज से:
- हम कब तक ऐसी घटनाओं पर चुप रहेंगे?
- कब तक रैगिंग को “मस्ती” का नाम देंगे?
- कब तक जातिगत भेदभाव को “मजाक” समझेंगे?
यह सिर्फ एक मौत नहीं, व्यवस्था की हत्या है
यह घटना सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं है।
यह उस व्यवस्था की नाकामी है जो छात्रों की सुरक्षा नहीं कर पाती। यह उस समाज का कलंक है जो आज भी जाति के नाम पर भेदभाव करता है। यह उस शिक्षा का अपमान है जो हमें इंसानियत सिखाने के बजाय क्रूरता सिखा रही है।
एक बेटी गई। उसके साथ उसके माता-पिता के सपने भी चले गए।
लेकिन सवाल यह है – अब क्या होगा?
क्या इस मामले में सख्त सजा होगी? क्या जिम्मेदार लोगों को दंडित किया जाएगा? क्या हर कॉलेज में एंटी-रैगिंग और एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल सक्रिय होंगे?
या फिर कुछ दिनों बाद यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?
अब वक्त है जागने का
यह खबर पढ़कर अगर आपका खून नहीं खौलता, तो शायद आप भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं जो ऐसी घटनाओं को जन्म देती है।
हर माता-पिता को सोचना चाहिए: क्या आपकी बेटी कॉलेज में सुरक्षित है?
हर छात्र-छात्रा को सोचना चाहिए: क्या आप किसी को प्रताड़ित तो नहीं कर रहे?
हर शिक्षक-प्रशासक को सोचना चाहिए: क्या आप अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
और हर नागरिक को आवाज उठानी चाहिए: “बस! अब और नहीं। अब हर कॉलेज में सख्ती होगी। अब हर शिकायत पर कार्रवाई होगी। अब हर बच्चा सुरक्षित होगा।”
न्याय की मांग
इस बच्ची को न्याय मिलना ही चाहिए।
दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। लापरवाह प्रशासन पर कार्रवाई होनी चाहिए। और सबसे जरूरी – ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
याद रखिए: कल तक यह किसी और की बेटी थी, लेकिन कल यह आपकी बेटी भी हो सकती है।
(इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि न्याय मिल सके और व्यवस्था में बदलाव हो सके)
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