शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ बड़े पर्दे पर बहुत बड़ी हिट बनने को तैयार है। लेकिन अब कुछ फिल्म देखने वालों ने शाहरुख की ‘जवान’ और अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘आखिरी रास्ता’ में सिमिलैरिटीज को ढूंढ निकाला है। क्या वाकई दोनों फिल्में एक जैसी हैं?शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ के सिनेमाघरों में हिट होने के बाद, कई फिल्मी कीड़ों ने अनुमान लगाया कि एटली की फिल्म का कुछ पार्ट अमिताभ बच्चन की 80 के दशक की हिट ‘आखिरी रास्ता’ से लिया गया है। दर्शकों ने दोनों फिल्मों के बीच कुछ समानताएं ढूंढ निकाली हैं। दोनों कहानियों में एक बेटा अपने दागी पिता का बदला लेता है और इस तरह से दोनों की कहानी एक जैसी लग रही है। संयोग यह है कि दोनों फिल्मों में लीड एक्टर को एक पुलिस वाले के रोल में दिखाया गया है
फिल्म एनालिटिक दिलीप ठाकुर ने ‘ईटाइम्स’ से हाल ही में बातचीत की, जिन्होंने दोनों फिल्मों के बीच समानताएं बताईं। दिलीप ठाकुर ने कहा, ‘आखिरी रास्ता की कहानी एक पिता और बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है। जया प्रदा फिल्म की एक्ट्रेस थीं। फिल्म में टीनू आनंद, सदाशिव अमरापुरकर और कादर खान जया प्रदा को परेशान करने की कोशिश करते हैं और उनकी मौत हो जाती है। अमिताभ बच्चन का किरदार बूढ़ा हो जाता है और उनका बेटा (यंग अमिताभ) एक पुलिस इंस्पेक्टर बन जाता है। बूढ़ा अमिताभ कदम दर कदम अपना बदला लेता है। यंग इंस्पेक्टर अमिताभ यह जांच करने की कोशिश करता है कि हत्यारा कौन है। कहानी ये थी।’
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अमिताभ बच्चन की आखिरी रास्ता
अलग फिल्में हैं ‘जवान’ और ‘आखिरी रास्ता’
दिलीप ठाकुर का कहना है कि इतनी सारी सिमिलैरिटी से परे, ‘जवान’ और ‘आखिरी रास्ता’ बिल्कुल अलग-अलग फिल्में हैं।’ अमिताभ बच्चन की फिल्म के बारे में कुछ दिलचस्प बातें याद करते हुए दिलीप ठाकुर ने कहा, ‘फिल्म सेमी-फिट थी। के. भाग्यराज के डायरेक्शन में बनी ‘आखिरी रास्ता’ कमल हासन की तमिल फिल्म ‘ओरु कैदियिन’ डायरी की रीमेक थी। उस दौरान, कमल हासन की फिल्मों के अक्सर रीमेक बनते रहते थे। ‘आखिरी रास्ता’ 1986 में रिलीज हुई थी और उस समय अमिताभ बच्चन का करियर ढलान पर था। इससे पहले उन्होंने ‘मर्द’ फिल्म की थी जो हिट रही लेकिन फिल्म की रिपोर्ट अच्छी नहीं थी।’
अमिताभ के टक्कर का कोई नहीं
उन्होंने आगे बताया, ’80 के दशक के दौरान उन्हें बूढ़ा हीरो कहा जाने लगा। उन्होंने स्क्रिप्ट के कुछ गलत ऑप्शन चुने। लेकिन बच्चन साहब का स्टारडम अछूता रहा। जब अमिताभ बच्चन अपने चरम पर थे, तो कोई भी दूसरा एक्टर उन पर हावी नहीं हो सकता था। लोगों को उम्मीद थी कि उस समय के कुछ एक्टर्स उनकी जगह ले सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1986 में अमिताभ बच्चन ने राजनीति में भी कदम रखा था और सिनेमा से थोड़ा कट गए।’