भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक पर्व रक्षाबंधन पूरे हिमाचल और उत्तर भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।

इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसके सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं, वहीं भाई जीवनभर बहन की रक्षा का संकल्प लेते हैं।

पर्व का महत्व

रक्षाबंधन केवल एक रस्म नहीं, बल्कि यह रिश्तों में विश्वास और स्नेह का बंधन मजबूत करने का अवसर है। यह पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि रक्षा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और नैतिक दायित्व भी है।

हिमाचल में उत्सव का रंग

हिमाचल के गाँवों और कस्बों में इस दिन विशेष रौनक देखने को मिलती है। बाजारों में रंग-बिरंगी राखियों, मिठाइयों और उपहारों की दुकानों पर भीड़ उमड़ती है। परिवार एकत्र होकर पारंपरिक व्यंजन जैसे कढ़ी-चावल, पूड़ी-हलवा और मिठाइयों का आनंद लेते हैं।
कई स्थानों पर स्कूलों और सामाजिक संगठनों द्वारा विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें सैनिकों, पुलिसकर्मियों और जरूरतमंदों को राखी बांधी जाती है।

हिमाचल की पौराणिक कथा और रक्षाबंधन

हिमाचल की लोककथाओं में रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्राचीन कहानी सुनाई जाती है। माना जाता है कि सतलुज नदी के तट पर बसे एक गाँव में बहन ने अपने चरवाहे भाई को राखी बांधकर जंगल में जाते समय यह आशीर्वाद दिया कि वह सदा सुरक्षित लौटे। उसी दिन गाँव में अचानक भालुओं का झुंड आ गया, लेकिन भाई चमत्कारिक रूप से सुरक्षित रहा। गाँव के बुजुर्गों ने इसे राखी के पवित्र धागे का प्रभाव माना और तब से यह परंपरा पहाड़ों में और गहराई से बस गई।
कुछ लोकगाथाओं में यह भी उल्लेख है कि कुल्लू घाटी में रक्षाबंधन के दिन स्थानीय देवता “रघुनाथ जी” की पूजा की जाती है और महिलाएँ देवालय में धागा चढ़ाकर अपने भाइयों की रक्षा की प्रार्थना करती हैं।

पुराणों में वर्णित राजा बलि और देवी लक्ष्मी की कथा

भागवत पुराण में वर्णित एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, असुरराज महाबली ने अपने सामर्थ्य से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उनसे तीन पग भूमि दान में माँगी। वामन ने दो पगों में धरती और स्वर्ग नाप लिए और तीसरे पग के लिए महाबली ने अपना सिर अर्पित कर दिया।
भगवान विष्णु ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया और स्वयं उनकी रक्षा के लिए द्वारपाल बनकर वहीं रहने लगे।
विष्णु के लंबे समय तक न लौटने से उनकी पत्नी देवी लक्ष्मी चिंतित हुईं। वे ब्राह्मण वेश में महाबली के पास पहुँचीं और उन्हें राखी बाँधकर भाई का संबंध स्थापित किया। जब महाबली ने बहन से वरदान माँगने को कहा, तो देवी लक्ष्मी ने विष्णु को लौटाने का आग्रह किया। महाबली ने वचन निभाते हुए विष्णु को उनके साथ भेज दिया।
तब से रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के रिश्ते के साथ-साथ वचन, सम्मान और रक्षा के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा।

हिमाचल के मंदिर और धार्मिक परंपराएँ

मंडी का त्रिलोकीनाथ मंदिर – यहाँ रक्षाबंधन के दिन विशेष पूजा होती है और भक्त मंदिर के शिवलिंग पर रक्षा सूत्र चढ़ाकर परिवार की मंगलकामना करते हैं।

कांगड़ा का ब्रजेश्वरी देवी मंदिर – इस दिन देवी को विशेष श्रृंगार कर “रक्षा सूत्र” अर्पित किया जाता है।

चंबा का मिंजर मेला – यह मेला रक्षाबंधन के आसपास आयोजित होता है और इसमें भाई-बहन एक-दूसरे को राखी बाँधने के साथ-साथ मिंजर (मक्का के फूल) भेंट कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

 

पंजाब में रक्षाबंधन का महत्व

पंजाब में रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम के साथ-साथ सांझी खुशियों और फसलों की दुआओं का प्रतीक माना जाता है।

यहाँ बहनें न केवल भाइयों को राखी बाँधती हैं, बल्कि खेतों की मेड़ों पर जाकर भी राखी या रक्षा सूत्र बाँधकर फसल की सुरक्षा और अच्छी पैदावार की कामना करती हैं।

कई सिख परिवार गुरुद्वारों में मत्था टेक कर अरदास करते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष भाई-बहन एक-दूसरे की लंबी उम्र और सुख-शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।

पंजाब के कुछ ग्रामीण इलाकों में इस दिन मेला या मेल-जोल का आयोजन होता है, जहाँ रिश्तेदार और पड़ोसी एक-दूसरे को मिठाई और तिलक के साथ शुभकामनाएँ देते हैं।

पुरानी परंपराओं में, पंजाब में राखी सिर्फ भाई-बहन तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पड़ोस, रिश्तेदारी और दोस्ती में भी विश्वास और रक्षा का वचन बाँधने का अवसर था।

संस्कृति और संदेश

रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति की उस सुंदर परंपरा को दर्शाता है जिसमें रिश्तों को निभाने, एक-दूसरे के प्रति समर्पण और सुरक्षा का वचन शामिल है। हिमाचल हो या पंजाब, यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते के साथ-साथ समाज में आपसी एकजुटता, प्रेम और सहयोग का भी प्रतीक है!
लेखक श्री सेवा सिंह ( प्रवक्ता) नालागढ़