जब अपनों ने मुँह मोड़ा, लायंस क्लब सोलन वैली  बना फरिश्ता – सोलन की गीता की संघर्षगाथा

सोलन की रहने वाली गीता की ज़िंदगी एक लंबी और दर्दभरी परीक्षा बन गई है। गैंगरीन जैसी गंभीर बीमारी ने उसकी एक टांग और एक पैर छीन लिया। दुख की बात यह रही कि जब उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी अपनों की, तब उन्होंने उसका साथ छोड़ दिया। न पैसा था, न सहारा… लेकिन गीता ने हार नहीं मानी। उस वक्त भी लोगों ने इंसानियत दिखाते हुए उसकी आर्थिक मदद की, लेकिन सरकारी मदद समय पर नहीं पहुंची। अब गीता कृत्रिम टांग की सहायता से थोड़ा-थोड़ा चलने लगी है। मगर परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई। गैंगरीन शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने का खतरा बना हुआ है। डॉक्टरों ने तुरंत इंजेक्शन लगवाने की सलाह दी है, लेकिन उसकी कीमत हज़ारों रुपये है – जो गीता के बस से बाहर है।ऐसे कठिन समय में लायंस क्लब सोलन वैली ने गीता की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया और 55,000 रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की। यह न सिर्फ आर्थिक मदद थी, बल्कि गीता के लिए एक नई उम्मीद की किरण भी बनी।लायंस क्लब सोलन वैली के पदाधिकारी  विनीत सूद ने भरोसा दिलाया कि वह आज बेहद खुश है कि उनके क्लब को सही समय पर गीता की  मदद करने का मौका मिल है।  उन्होंने कहा कि अगर कोई और ज़रूरतमंद व्यक्ति उनके पास आएगा तो वे मदद के लिए हमेशा तैयार रहेंगे। byte विनीत सूदगीता और उसके पति ने भावुक होकर लायंस क्लब का धन्यवाद किया और कहा, जब अपने लोगों ने पीठ फेर ली, तब यह संस्था हमारे लिए देवदूत बनकर आई। दो साल से राशन वाले का उधार चुकाया नहीं है और इंजेक्शन में एक महीने की देरी हो चुकी थी। आज अगर क्लब साथ नहीं देता तो शायद हालात और बिगड़ जाते। byte geeta or husbandगीता की यह कहानी सिर्फ एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि यह समाज की संवेदना और इंसानियत की एक मिसाल है। लायंस क्लब सोलन वैली जैसे सामाजिक संस्थाओं की दरकार आज हर उस गीता को है, जिसे ज़रूरत के समय सिर्फ एक सहारे की तलाश रहती है।